किसी महिला की इज्जत को छूने की कोशिश से बड़ा कोई अपमान नहीं, गुजरात हाईकोर्ट ने 12 साल की लड़की की अबॉर्शन याचिका स्वीकार की; पिता पर रेप का आरोप
गुजरात हाईकोर्ट ने 12 साल की एक लड़की की लगभग 27 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की याचिका स्वीकार कर ली। लड़की का बलात्कार करने का आरोप उसके उसके पिता के ऊपर है । कोर्ट ने फैसले में कहा, किसी महिला की इज्जत को छूने की कोशिश करने से बड़ा कोई अपमान नहीं है। जस्टिस समीर जे दवे की पीठ ने मामले को दुखद और आश्चर्यजनक माना। उन्होंने फैसले में 'दुर्गा सप्तशती' का उल्लेख करते हुए कहा, "स्त्रिया: समस्ता: सकला जगत्सु [जगत की समस्त स्त्रियां तुम्हारा ही स्वरूप हैं] अर्थात हे देवी जगदम्बे, जगत में जितनी भी स्त्रियां हैं, वह सब तुम्हारी ही मूर्तियां हैं । इसलिए अगर स्त्री चाहे तो वह सब कर सकती हैं जो वह करना चाहती हैं, यह ताकत सिर्फ उसी मे हैं, जो बड़े बड़े संकटों का नाश कर, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ और कठिनतम कार्य भी पूर्ण कर सकती हैं । जरुरत हैं तो सर्वशक्तिमान नारी को स्वयं को पहचानने को...।"
उसी दिन, अदालत ने वडोदरा स्थित अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी और चिकित्सा अधीक्षक को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत पीड़िता की जांच करने और अदालत के समक्ष एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। कोर्ट का 6 सितंबर का आदेश बुधवार को कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का अवलोकन किया, जिसमें कहा गया था कि पीड़ित लड़की 26 सप्ताह और पांच दिन की गर्भवती है। उसके शरीर में किसी महत्वपूर्ण प्रणालीगत असामान्यता का पता नहीं चला है। रिपोर्ट में गर्भावस्था से जुड़ी किसी भी जटिलता के लक्षण भी नहीं दिखे।
इसलिए, अभियुक्त के कृत्य की आपराधिकता पर चर्चा किए बिना न्यायालय ने चिकित्सा अधिकारी और चिकित्सा अधीक्षक, एसएसजी अस्पताल, वडोदरा को यथाशीघ्र प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देकर पीड़िता की गर्भावस्था की चिकित्सीय समाप्ति का आदेश देना उचित समझा। कोर्ट ने आगे कहा, "उम्मीद है कि संबंधित प्रतिवादी-अधिकारी आवश्यक देखभाल, संवेदनशीलता और सावधानी बरतेंगे ताकि पीड़ित लड़की की उम्र के साथ-साथ उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उसकी गर्भावस्था की चिकित्सीय समाप्ति की प्रक्रिया सुचारू रूप से की जा सके।''
इसके अलावा, पीड़िता की कम उम्र और इस तथ्य पर विचार करते हुए कि पीड़िता को कठोर मानसिक/शारीरिक पीड़ा से गुजरना पड़ा, प्रतिवादी-राज्य को आवेदक को मुआवजे के रूप में 2,50,000 रुपये देने का निर्देश दिया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि में राज्य सरकार का संबंधित विभाग इस स्तर पर अभिभावक की हैसियत से पीड़िता/उसकी मां को 50,00 रुपये का भुगतान करेगा। शेष दो लाख रुपये का रुपये पीड़ित के नाम पर किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट रिसीट (एफडीआर) के रूप में रखा जाए। एफडीआर के संबंध में कोर्ट ने संबंधित जिला कलेक्टर को पीड़िता के 21 साल का होने तक उसका संरक्षक नियुक्त किया। न्यायालय ने कहा कि एफडीआर पर अर्जित वार्षिक ब्याज पीड़िता को नियमित आधार पर तब तक दी जाएगी, जब तक कि वह 21 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेती। इसके साथ ही याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

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