लाखों किलोमीटर की दूरी तय कर के हजारों पक्षी भारत क्यों आते हैं?
लाखों किलोमीटर की दूरी तय कर के हजारों पक्षी भारत क्यों आते हैं?
…लघु सुरधनु से पंख पसारे , शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किये समझ नीड़ निज प्यारा ।
अरुण यह मधुमय देश हमारा,जहाँ पहुंच ,
अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा ।।…
बरबस कानों में गूंजती 'प्रसाद' की यह पंक्तियाँ बता ही देती हैं , क्यों आते हैं ये हजारों पंछी ? भारत से उनका लगाव कितना पुराना है ?
हर वर्ष गुलाबी सर्दियों में हमारे देश की नदियां, तालाब-झील, वन- उद्यान सभी रंग-बिरंगे पक्षियों की चहचहाट से गुंजरित हो उठते हैं। दूर परदेश से आये इन पक्षियों की वजह से प्रकृति में रौनक बढ़ने लगती है। श्रीनगर की डल झील हो या उड़ीसा की चिल्का झील, भोपाल की बड़ी झील या भागलपुर का दियारा — देश के हर कोने में लोग इन पक्षियों के आकर्षण में बंधे चले आते हैं।
ये पंछी कहलाते हैं प्रवासी पंछी और यह घटना पक्षियों का प्रवास कहलाती है ।
पक्षियों में प्रवासन — ऋतु परिवर्तन के कारण पक्षियों का प्रवासन प्रकृति की एक विलक्षण घटना है।
ये प्रवासी पक्षी शीतोष्ण कटिबंध में या उससे अधिक ऊँचाई पर रहते हैं। गरमियों में शीतोष्ण कटिबंध या ऊँचाई पर मौसम इनके अनुकूल होता है। दिन बड़े होते हैं , जिससे पक्षियों को अपने तथा शिशुओं के लिये आहार जुटाने का पूरा समय मिलता है। गरमियों में हरे - भरे प्रदेश प्रचुर आहार से सम्पन्न होते हैं। ये उनका पूरा लाभ उठाकर फलते फूलते और प्रजनन करते हैं।
शीत ऋतु के आने पर ताप गिरने लगता है, दिन छोटे होने लगते हैं और बर्फ पड़ने लगती है। आहार की अनुपलब्धता और भीषण ठंड उनके जीवन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। यह स्थिति वयस्कों और बच्चों , दोनों को यह स्थान छोड़कर अनुकूल मौसम वाली जगहों पर जाने का उद्दीपन देती है।
अत: शीत ऋतु में पक्षी निम्न ऊँचाई के उष्ण कटिबंधों में प्रवास के लिए उड़ान भरते हैं । जहाँ बड़े दिन और प्रचुर आहार से उन्हें जीने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं। इन उष्ण कटिबंधीय स्थानों को शीत-निवास-स्थल कहते हैं।
पुनः प्रजनन हेतु पक्षी प्रवास का मार्ग चुनते हैं और अपने प्रजनन स्थान को लौट पड़ते हैं, जहाँ ऋतु बदल चुकी होती है। कीड़े-मकोड़े और नए अंकुरित होते पौधे भरपूर संख्या में उपलब्ध होते हैं।
प्रजनन स्थान से शीत निवास को और वहाँ से वापसी यात्रा का यह चक्र प्रति वर्ष चलता है। प्रजनन स्थान पर सर्दी असह्य पड़ती है और शीत निवास स्थान में असह्य गरमी पड़ती है। प्रवासी पक्षी प्रवासन द्वारा प्रजनन स्थान की सर्दी और शीत-निवास-स्थल की गरमी से बच जाते हैं।
ये पक्षी हजारों की संख्या में एक साथ उड़ते हैं । हजारों किलोमीटर की यात्रा में वे कई देशों से गुजरते हैं । विस्मय की बात ये है कि इनका उड़ान - पथ निश्चित होता है । जो पीढ़ी- दर -पीढ़ी चला आ रहा है। इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि रात में उड़ान भरते ये पक्षी अपना रास्ता तारों की स्थिति और पृथ्वी की चुम्बकीय तरंगों की मदद से तय करते हैं।
पक्षियों का उड़ान पथ या फ्लाई वे —प्रवासी पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों के निश्चित उड़ान पथ या फ्लाई वे हैं। यहाँ तक कि उन पथों पर ठहराव और भोजन ग्रहण करने के स्थान भी निश्चित होते हैं। अभी तक इनके मुख्य नौ उड़ान पथ देखे गए हैं। जिन पर 2274 नस्ल के पक्षी उड़ान भरते हैं।
सेंट्रल एशियन फ्लाई वे(सीएएफ)
इन्हीं नौ वैश्विक फ्लाइवे में से एक है जो साइबेरिया के प्रजनन स्थल से शुरू होकर पश्चिम और दक्षिण एशिया के आखिरी छोर तक जाता है। यह करीब 30 देशों को जोड़ता है।
इस फ्लाइवे पर 182 नस्ल के पक्षी यात्रा करते हैं। जिनमें से करीब 71 प्रतिशत भारत पहुँचते हैं। भारत में प्रकृति बांहें पसारे इनका स्वागत करती है। यहां इन पक्षियों के लिए भरपूर भोजन , निवास स्थल आदि मौजूद हैं।
प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक —
प्रवास के लिये उड़ान के दौरान इन पक्षियों को ढेर सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रतिकूल मौसम , ठहराव स्थलों का घटना और शिकार हो जाने का खतरा हर पल इनके ऊपर मंडराता रहता है । यह बहुत दुखद है कि अनगिनत पक्षी इस उड़ान से वापस नहीं आ पाते।
मानवीय गतिविधियों की सबसे बड़ी कीमत इन पक्षियों को ही चुकानी पड़ रही है। जलवायु में तेजी से हो रहे बदलाव, भूमि, जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण , बिजली के तार , मोबाइल तरंगें — इन सभी ने पक्षियों को सबसे ज्यादा कुप्रभावित किया है।
अगर इन कारणों को दूर न किया गया तो कई नस्लें जो विलुप्त होने के कगार पर हैं, उनसे हम हाथ धो बैठेंगे।
पक्षियों के संरक्षण के लिये जन जागरुकता बढ़ाना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से हर वर्ष मई माह के दूसरे शनिवार को अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी दिवस दुनिया के विभिन्न देशों में मनाया जाता है।
भगवान के इन डाकियों को बचाना हम सब का पावन कर्तव्य है।
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