शैवाल ( Algae )


शैवाल(Algae)- 
1.शैवाल पर्णहरित युक्त पौधे हैं, 
2. इनमें वास्तविक जड़ें तना तथा पत्तियाँ आदि नहीं होती, अतः इन्हें थैलोफाइटा (Ophthalmology) वर्ग के अन्तर्गत रखा गया है। 

3.इनमें लिंगी प्रजनन के बाद भ्रूण नहीं बनता।
 
4.शैवाल समान्यतः नम स्थानों पर पाये जाते हैं, कुछ शैवाल पानी की सतह पर तैरते रहते हैं। जैसे डाइएटम्स, वालवाक्स, स्पायरोगायरा आदि। 
5.कुछ शैवाल दूसरे पौधों पर उगते हैं जैसे ऊडोगोनियम तथा कुछ शैवाल जन्तुओं के शरीर पर पाये जाते हैं जैसे घोंघे के ऊपर पाया जाने वाला शैवाल क्लैडोफोरा, कछुओं की पीठ पर प्रोटोडर्मा। जूक्लोरेला नामक शैवाल ’हाइड्रा’ नामक जन्तु के अन्दर पाया जाता है।

शैवालों को लगभग 7 संघों मेे विभाजित किया गया है-.....

1 . सायनोफाइटा ( cyanophyta ) - नीले - हरे - जैसे नास्टॉक ( Nostoc ) 
2 . यूग्लीनोफाइटा ( euglenophyta ) - जैसे - यूग्लीना ( Englena ) 
3 . क्लोरोफाइटा ( chlorophyta ) - हरे - जैसे - वॉलवॉक्स ( Volvox ) 
4 . क्राइसोफाइटा ( chrysophyta ) - पीले - हरे - जैसे - डाइएटम ( diatoms ) 
5 . पाइरोफाइटा ( pyrrophyta ) - सुनहरे - भूरे - जैसे - जिम्नोडिनियम 
6 . फीयोफाइटा ( phaeophyta ) - भूरे - जैसे - फ्यूकस ( Fucus ) 
7 . रोडोफाइटा ( rhodophyta ) - लाल - जैसे - पॉलीसाइफोनियम ( Polysiphonia ) पुराने वर्गीकरण के कवक ( fungi )


(1) साइनोफाइटा :- नीले हरे शैवालों को कहते हैं। इनमें एक कोशिकीय या तन्तुमय मण्डल, प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ, भोजन प्रोटीन और ग्लाइकोजन के रूप में तथा लैंगिक जनन का अभाव होता है। वायु की आक्सीजन को स्थिरीकरण करने का गुण होता है। नास्टाक, एनाबीना, आसिलेटोरिया आदि इसी प्रकार के शैवाल हैं।
(2) यूग्लीनोफाइटा :- एक कोशिकीय हरे रंग के जन्तुओं के समान भोजन ग्रहण करने की क्षमता इनमें होती है। ’युग्लीना’ इसका उदाहरण है।

(3) क्लोरोफाइटा :- भोजन मण्ड के रूप में प्रोटीन से बनी पाइरीनायड पर संचित रहता है। ये स्वच्छ जल में ही मिलते हैं।

क्लोरेला, वालवाक्स, यूलोथ्रिक्स तथा स्पाइरोगाइरा आदि इसके उदाहरण है



(4) क्राइसोफाइटा :- पीले हरे शैवालों को कहते हैं। इसमें पर्णहरित के साथ पीले हरे वर्णक होते हैं। इनकी कोशिकाभित्ति सिलिकायुक्त और दो धारीदार कपाट के समान होती है। इनमें संचित भोजन वसा एवं ल्यूकोसीन के रूप में होते हैं। जैसे-’डायटम्स’।
(5) पाइरोफाइटा :- समुद्री पानी में मिलने वाले सुनहरे भूरे शैवाल होते हैं। इनमें पर्णहरित के साथ सुनहरे-भूरे वर्णक होते हैं। डाइनोप्लेजिलेट्स, क्रिप्टोमोनेड्स आदि इसके उदाहरण हैं।


(6) फियोफाइटा :- समुद्री जल में मिलने वाले भूरे शैवाल होते हैं। इनमें पर्णहरित के साथ भूरा वर्णक ’फ्यूकोजैन्थिन’ होता है। फ्यूकस, सारगासम आदि इसके उदाहरण हैं।

(7) रोडोफाइटा :- लाल शैवालों को कहते हैं। इनमें पर्णहरित के साथ लाल वर्णक फाइकोइरीथ्रिन होते हैं। इनमें एल्जेनिक एसिड और फ्लोरिसाइड्स संचित होते हैं। लाल सागर का जल इसी शैवाल की उपस्थित से लाल दिखायी देता है। पोलीसाइफोनिया, बैट्रोकोस्पर्मम इसके उदाहरण हैं।

✳️ शैवालों (Algae ) का आर्थिक महत्व :- 

       ➤शैवालों का उपयोग भोजन के रूप में, उद्योगों में, नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा अन्य कार्यों में होता है।

      ➤शैवालों में प्रोटीन, कार्बोहाइडेªट्स तथा खनिज पदार्थ बहुतायत में पाये जाते हैं। 

      ➤(Ulva) में प्रोटीन लगभग 19% कार्बोहाइड्रेटलगभग 50% खनिज लवण लगभग 15-16% तक मिलते हैं।

     ➤पोइफाइरा का जापान, इग्लैण्ड, चीन, कैलीफोर्निया आदि देशों में खाद्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

     ➤अल्वा, फ्यूकस, लैमीनेरिया आदि अनेक शैवालों को भोजन के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।

👉 क्लोरेला :- 

      ➤एक कोशिकीय शैवाल हैं। 

      ➤इसमें सभी विटामिन पाये जाते हैं। 

     ➤इसे भविष्य का भोजन माना जा रहा है।

     ➤लैमीनेरिया, फ्यूकस, एस्कोफिलम आदि अनेक प्रकार के शैवालों को फ्रांस, नार्वे, डेनमार्क, अमेरिका आदि देशों में चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है।

     ➤उद्योगों में लैमीनेरिया, फ्यूकस आदि शैवालों की विभिन्न जातियों से आयोडीन तथा पोटैशियम प्राप्त किया जाता है।

     ➤अलेरिया लैमिनेरिया आदि भूरे-शैवालों से प्राप्त एल्गिन नामक पदार्थ का प्रयोग आइसक्रीम, प्लास्टिक पेण्ट, कृत्रिम रेशा, औषधियां, शैम्पू आदि बनाने में किया जाता है।

👉केरीगिनीन :-

 से प्राप्त काॅण्ड्रस का उपयोग आइसक्रीम, श्रृंगार प्रसाधन, जेली, चाकलेक आदि में किया जाता है।

👉डायटम :- 

एक कोशिकीय शैवाल है जिनसे डायटमी मृदा बनती है। 
    ➤यह मृदा लगभग 1500 ºc का ताप सहन कर लेती है। 
    ➤यह मिट्टी शक्कर-सफाई कारखानों, साबुन निर्माण, डायनामाइट, सीमेण्ट, रबर आदि उद्योगों में प्रयोग में लायी जाती है।

     ➤इसका उपयोग अवशोषक, अवरोधक आदि के रूप में किया जाता है।

     ➤नाइट्रोजन स्थिरीकरण में ऐनाबीना, नास्टाॅक, आॅसीलेटोरिया आदि का प्रयोग किया जाता है। 

     ➤नीली-हरी शैवाल भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं।
  
     ➤कारा, नाइटेला आदि शैवालों का उपयोग जल की सफाई में होता है। 

     ➤क्लोरेला शैवाल से क्लोरोलिन नामक प्रतिजैविक प्राप्त है।

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