Q. About Zoology ?

प्राणिविज्ञान (Zoology) विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें प्राणियों या जंतुओं का अध्ययन होता है। 

✴️यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने ईसा के 300 वर्ष पूर्व जंतुओं पर एक पुस्तक लिखी थी। गैलेना (Galena) एक दूसरे रोमन वैद्य थे, 
✴️


some Branch of Zoology .....

आकारिकी (Morphology),
ऊतकविज्ञान (Histology),
कोशिकाविज्ञान (Cystology),
भ्रूणविज्ञान (Embryology),
जीवाश्मविज्ञान (Palaeontology),
विकृतिविज्ञान (Pathology),
वर्गिकी (Taxology),
आनुवांशिकी (Genetics),
जीवविकास (Evolution),
पारिस्थितिकी (Ecology) तथा
पक्षीविज्ञान (ओर्निथोलोजी)
मनोविज्ञान (Psychology)
______________________________________

आकारिकी (Morphology), - 
👉जंतु भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। उनके बाह्य लक्षण, शरीर का आकार, विस्तार, वर्ण, त्वचा, बाल, पर, आँख, कान, पैर तथा अन्य अंग भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं

 👉जंतु कोशिकाओं से बने हैं। सब जंतुओं की कोशिकाएँ एक सी नहीं होतीं। 

👉कुछ जंतु एक कोशिका से बने हैं, इन्हें एककोशिकीय या प्रोटोजोआ (Protozoa) कहते हैं। इनकी संख्या अपेक्षया थोड़ी है। 

👉अधिकतर जंतु अनेक कोशिकाओं से बने हैं। इन्हें बहुकोशिकीय या मेटाज़ोआ (Metazoa) कहते हैं। 
इनकी संख्या बहुत बड़ी है। 

👉अधिकांश जंतु रीढ़वाले या कशेरुकी (verterbate) हैं और अपेक्षया कुछ थोड़े से ही अकशेरुकी या अपृष्ठवंशी (invertebrate) हैं।

सूक्ष्मऊतकविज्ञान -
👉इसके अध्ययन के लिए विभिन्न जंतुओं के ऊतकों को महीन काटकर, उसी रूप में अथवा रंजकों से अभिरंजित कर, सूक्ष्मदर्शी से निरीक्षण कते हैं। रंजक के उपयोग से कोशिकाएँ अधिक स्पष्ट हो जाती हैं पर उससे कोशिकाओं की कोई क्षति नहीं होती। 

👉कोशिकाओं को बहुत महीन काटने के लिए (1/1000 मिमी. की मोटाई तक) यंत्र बने हैं, जिन्हें माइक्रोटोम कहते हैं। ऐसे अध्ययन से ऊतकों को सामान्यत: निम्नलिखित चार प्रकार में विभक्त किया गया है : 

✳️ उपकलाऊतक (Epithelial tissue), 
❇️ तंत्रिका ऊतक (Nervous tissue)
✳️ संयोजीऊतक (Connective tissue) तथा 
❇️ पेशीऊतक (Muscular tissue)।

कोशिकाविज्ञान - 
👉 इसके अंतर्गत जंतुओं की कोशिकाओं का अध्ययन होता है। इनकी कोशिकाओं में जीवद्रव्य (protoplasm) रहता है।

👉कुछ कोशिकाएँ एककोशिकीय होती हैं और कुछ बहुकोशिकीय। 

👉 सामान्य कोशिका के दो भाग होते हैं:
✳️एक केंद्रक होता है और
✳️ दूसरा उसको घेरे हुए कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) होता है।


भ्रूणविज्ञान - 
👉 Embryology is a branch of science that is related to the formation, growth, and development of embryo. It deals with the prenatal stage of development beginning from formation of gametes, fertilization, formation of zygote, development of embryo and fetus to the birth of a new individual


जीवश्मविज्ञान - 
👉अनेक जंतु ऐसे हैं जो एक समय इस पृथ्वी पर विद्यमान थे। पर वे अब कहीं-कहीं पाए जाते हैं। इनके जीवाश्म पृथ्वीस्तरों या चट्टानों में पाए जाते हैं। इनसे संबंधित बातों के अध्ययन को जीवाश्मविज्ञान कहते हैं। 

👉अध्ययन से पता लगता है कि ये जंतु किस युग में, कितने लाखों या करोड़ों वर्ष पूर्व विद्यमान थे और वर्तमान युग के कौन-कौन जंतु उनसे संबंधित कहे जा सकते हैं। उच्च प्राणियों के विकास में कौन-कौन अवस्थाएँ हुईं, इनका पता भी जीवाश्म के अध्ययन से बहुत कुछ लगता है। 

आनुवांशिक विज्ञान - 
👉विज्ञान की इस शाखा क संबंध प्राणियों की अनुवांशिकता, विभिन्नता, परिवर्धन और विकास से है। 


विकास - इसके अंतर्गत विभिन्न जंतुओं का विकास होकर आधुनिक रूप कैसे प्राप्त हुआ है, इसका अध्ययन होता है।


पारिस्थितिकी - प्राणी कैसे वातावरण में रहते हैं, कैसा वातावरण उनके अनुकूल होता है और कैसा वातावरण प्रतिकूल, इसका अध्ययन पारिस्थितिकी में होता है। 

वातावरण के कारक भौतिक हो सते हैं अथवा रासायनिक। ताप, प्रकाश, आर्द्रता तथा समुद्री जंतुओं के संबंध में समुद्रजल में लवण की मात्रा, जल की गहराई और जल का दबाव इत्यादि विभिन्न कारक हैं, जिनका अध्ययन इसके अंतर्गत आता है। पृथ्वीतल के विभिन्न भागों पर जंतु कैसे फैले हुए हैं, इसका भी अध्ययन इसके अंतर्गत होता है।

जंतुरोग विज्ञान - इसके अंतर्गत जंतुओं के रोगों का अध्ययन होता है। मानव हित के लिए यह जानना आवश्यक होता है कि जिन जंतुओं को हम खाते अथवा जिनसे हम दूध, मक्खन, अंडा आदि प्राप्त करते हैं, वे स्वस्थ हैं या नहीं। पशुओं की अस्वस्थता का प्रभाव मानवशरीर पर भी पड़ सकता है। उससे बचने के लिए जंतुओं के रोगों का अध्ययन बड़ा महत्व रखता है। रोगों से अनेक जंतु मर भी जाते हैं, जिससे आर्थिक दृष्टि से बहुत बड़ी क्षति होती है।

मनोविज्ञान - जंतुओं का मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, उनमें कितनी समझ है, सिखाने से वे कहाँ तक सीख सकते हैं, इनका मानव तथा अन्य जंतुओं के प्रति कैसा व्यवहार होता है, इत्यादि का अध्ययन मनोविज्ञान के अंतर्गत होता है। उपर्युक्त बातों के अध्ययन से मनुष्य को बहुत लाभ हो सकता है। कुत्ते के प्रशिक्षण से चोरों, डाकुओं या हत्यारों का पकड़ना आज बहुत कुछ सुलभ हो गया है। प्रशिक्षण से ही हाथी जंगलों में लकड़ियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है और सवारी का काम देता है।

वर्गीकरण - प्राणियों की सख्या बहुत अधिक हो गई है। अब तक इनके दो लाख वंशों और 10 लाख जातियों का पता लगा है। प्राणियों के अध्ययन के लिए प्राणियों का वर्गीकरण बहुत आवश्यक हो गया है। वर्गीकरण कठिन कार्य है। विभिन्न प्राणिविज्ञानी वर्गीकरण में एकमत नहीं हैं। विभिन्न ग्रंथकारों ने विभिन्न प्रकार से जंतुओं का वर्गीकरण किया है। कुछ प्राणी ऐसे हैं जिनको किसी एक वर्ग में रखना भी कठिन होता है, क्योंकि इनके कुछ गुण एक वर्ग के जंतुओं से मिलते हैं तो कुछ गुण दूसरे वर्ग के जंतुओं से। साधारणतया सभी वैज्ञानिक सहमत हैं कि जंतुओं का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से होना चाहिए जिसमें छोटे समूह से प्रारंभ करके क्रमश: बड़े-बड़े समूह दिए हैं : 
1. जाति (species),
2. वंश (genus), 
3. कुल (family), 
4. गण (order), 
5. वर्ग (class) तथा 
6. संघ या फाइलम (phyllum)। इन विभाजनों के भी अंतर्विभाग हैं जिन्हें उप (sub), अव या अध: (infra) और अधि (super) जोड़कर बनाते हैं।


जाति - जंतुओं का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार के जंतुओं को अलग अलग करके शुरू करते हैं। हम देखते हैं कि गाय समस्त संसार में प्राय: एक सी होती है ओर वह घोड़े या भैंस से भिन्न होती है। अत: हम गाय को एक जाति में रखते हैं, घोड़े और भैंस को अलग-अलग दूसरी जातियों में। गाय की जाति घोड़े और भैंस की जातियों से भिन्न है। कुछ जातियों की उपजातियाँ भी हैं। कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनका एक दूसरे से विभेद करना कठिन होता है।

वंश - कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनकी आकारिकी में बहुत सादृश्य है, पर बाह्य आकार में विभिन्नता देखी जाती है। इस प्रकार की कई जातियाँ हो सकती हैं जिनके बाह्य रूप में अंतर होने पर भी आकारिकी में सादृश्य हो। ऐसी विभिन्न जातियों को एक वंश के अंतर्गत रखने के लिए उनमें कितनी समानता और कितनी विभिन्नता रखनी चाहिए, इसका निर्णय वैज्ञानिकों पर निर्भर करता है और बहुधा कुछ जातियाँ एक वंश से दूसरे वंश में बदलती हुई पाई जाती हैं। पहले ऐसा होना सामान्य बात थी, पर अब इसमें बहुत कुछ स्थिरता आ गई है।

कुल - कुछ ऐसे वंश है जिनके प्राणियों में समानता देखी जाती है। ऐसे विभिन्न वंशवाले जंतुओं को एक स्थान पर एक कुल के अंतर्गत रखते हैं।

गण - एक ही किस्म की बनावट तथा सामान्य गुणवाले विभिन्न कुलों के जंतुओं को एक साथ रखने की आवश्यकता पड़ सकती है। इन्हें जिस वर्ग में रखते हैं उसे 'गण' कहते हैं। कई कुल मिलकर गण बनते हैं पर कुछ प्राणिविद् कुल और गण को पर्यायवाची शब्द मानते हैं। प्राणिविद् जंतुओं में ऐसा विभेद करने के लिए उनमें विशेष अंतर नहीं पाते, यद्यपि पादपविज्ञान में ऐसा अंतर स्पष्ट रूप से देखा जाता है।

वर्ग - जंतुओं के उस समूह को कहते हैं, जिसका पद गण और संघ के बीच का होता है।

संघ - जंतुजगत्‌ का प्रारंभिक विभाजन संघ है। प्रत्येक संघ के प्राणियों की संरचना विशिष्ट होती है जिसके कारण प्रत्येक संघ के प्राणी एक दूसरे से भिन्न होते हैं। जंतुजगत्‌ के प्राणियों का विभाजन दो उपजगतों में हुआ है। जो जंतु केवल एक कोशिका के बने हैं उन्हें प्रोटोजोआ (Protozoa) कहते हैं। यह उपजगत्‌ अपेक्षया बहुत छोटा है। जिस जगत्‌ में सबसे अधिक संख्या में जंतु आते हैं उसे मेटाजोआ (Metazco) कहते हैं। ये बहुकोशिकाओं के बने होते हैं।

जंतुओं का नामकरण - विभिन्न देशों और विभिन्न भाषाओं में जंतुओं के नाम भिन्न भिन्न होते हैं। इससे इनके अध्ययन में कठिनता होती है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से नामों में एरूपता लाना अत्यावश्यक है। नामों में एकरूपता लाने का 
सर्वप्रथम प्रयास लिनीयस (Linnaeus) ने किया। उन्होंने सब जंतुओं को लैटिन नाम दिया। इस नामकरण के अनुसार जंतुओं के नाम दो शब्दों से बने होते हैं। इस प्रणाली को 'द्विपद प्रणाली' (Binomial System) कहते हैं। 
इसके अनुसार जंतुओं का पहला नाम वंशिक नाम वंशिक नाम होता है और दूसरा उसका विशिष्ट नाम। वंशिक नाम अंग्रेजी के कैपिटल अक्षर से और दूसरा नाम छोटे अक्षर से लिख जाता है। इससे विभिन्न देशों में विभिन्न नामों से जो अव्यवस्था अव्यवस्था होती थी, वह दूर हो गई और इस प्रकार नामों में एकरूपता आ गई। ये वैज्ञानिक नाम आज बड़े महत्व के हैं और इनसे विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों को जंतुओं के अध्ययन में बड़ी सहायता मिली है।

प्रोटोजोआ संघ - 
✴️प्राय: सब ही प्रोटोज़ोआ बहुत छोटे जंतु होते हैं 
और साधारणतया सूक्ष्मदर्शी के सहारे ही देखे जाते हैं। ✴️इनमें कुछ कशाभिका (flagellum) द्वारा, कुछ पक्ष्माभिका (cilia) द्वारा तथा कुछ अन्य साधनों से तैरते हुए पाए जाते हैं।
✴️अधिकांश प्रोटोज़ोआ परजीवी होते हैं तथा बड़े बड़े जीवों पर आश्रित हाते हैं। 
✴️ये अनेक रोगों, जैसे मलेरिया, निद्रारोग इत्यादि के कारण होते हैं। 
✴️इस संघ के अंतर्गत निम्नलिखित वर्ग आते हैं :

वर्ग - 1. फ्लैजेलेटा (Flagellata), वर्ग - 2. राइजॉपोडा (Rhizopoda), वर्ग - 3. सिलिएटा (Ciliata), वर्ग - 4. टेलोस्पोरिडा (Telosporidia), वर्ग - 5. नाइडास्पोरिडिया (Cnidasporidia) तथा वर्ग - 6. ऐक्निडोस्पोरिडिया (Acnidosporidia)।


पॉरिफेरा (Porifera) संघ - 
✴️इस संघ में स्पंजी जंतु आते हैं। 
✴️ये एक स्थान पर बढ़ते हैं और अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं। 
✴️इनका शरीर वस्तुत: कोशों का बना होता है, 
✴️शरीर में अनेक छोटे छोटे छिद्र (pores) होते हैं। 
✴️इन छिद्रों से पानी जाता है, इन्हीं से इन्हें भोजन मिलता है। 
✴️इनमें भोजन के लिए कोई मुख या इंद्रियाँ नहीं होतीं। ✴️अनेक छोटी छोटी, कड़ी कंटिकाओं (spicules) के कारण इनका शरीर कड़ा होता है। 
✴️इन्हीं से इनका पंजर बनता है, जैसा हम स्पंज में देखते हैं। 
✴️इनकी कोशिकाएँ ऊतकों से बनी होती हैं।


सिलेंटरेटा (Coelenterata) संघ - 
◾इसके अंतर्गत प्रवाल (मूँगा), जेली फिश, आनमोनि (anemones) आदि सरल जंतु आते हैं। 
◾इनका शरीर सामान्य कोशिकाओं के सघन स्तरों के बने होते हैं जो एक दूसरे से भिन्न होते हैं। 
यही बनावट अन्य उच्चतर जंतुओं की बनावट का ◾सिलेंटरेटा में एक ही सूराख होता है, जो मुख और गुदा दोनों का कार्य करता है।
◾इनके विभिन्न अंग इनके मुख के चारों ओर वृत्ताकार व्यवस्थित रहते हैं। 
◾एक समय इसी के अंतर्गत टिनॉफोरा (Ctenophora) भी रखे जाते थे, पर अब अनेक प्राणिविदों ने इन्हें एक अलग संघ में रखा है।


प्लैटीहेल्मिंथीज़ संघ (Platyhelminthes) - 
◾इसके अंतर्गत चपटे कृमि (flat worms) सदृश अनेक कृमि आते हैं। 
◾इनके शरीर की बनावट अधिक विकसित पाई जाती है। ऐसे चपटे कृमि कुछ तो तालाबों और सरिताओं में स्वतंत्र रूप से रहते पाए जाते हैं और कुछ, जैसे पर्णाभ कृमि (flukes), रुधिर पर्णाभ कृमि तथा फीताकृमि (tapeworm) परजीवी होते हैं। 
◾इनके शरीर की बनावट सममित होती है, अर्थात्‌ एक आधा दूसरे आधे भाग का दर्पणबिंब होता है। 
◾इनके शरीर में बाह्य और अंतर त्वचाओं के बीच एक तीसरा स्तर मध्यजनस्तर (mesoderm) होता है।


नेमाटोडा (Nematoda) संघ - 
✴️इस संघ में छोटे छोटे गोलकृमि (round worm) आते हैं। 
✴️ये कई प्रकार के परजीवी होते हैं। 
✴️इनके अंतर्गत अंकुश कृमि (hook worm) और ट्राइकिना (trichina) आते हैं जो मनुष्यों और अन्य उच्च जंतुओं की आँत में बहुधा पाए जाते हैं। 
✴️इनके शरीर में कुछ ऐसे प्रगतिशील लक्षण पाए जाते हैं, जो चपटे कृमि में नहीं होते। 
✴️इनकी आहारनली (gut) में मुख और गुदा अलग अलग होते हैं। 
✴️इसी के अंतर्गत गोर्डियेसी (Gordiacea) आते हैं।



ऐनेलिडा (Annelida) - 
✴️इसके प्राणी खंडयुक्त कृमि हैं। 
✴️इनमें कशेरुक नहीं होता, अन्यथा ये बहुत अधिक परिवर्धित जंतु हैं। 
✴️सामान्य केंचुआ इसी वर्ग का जंतु है। 
✴️जोंक भी इसी संघ का सदस्य है। 
✴️इनकी विशेषता यह है कि इनका शरीर कई खंडो में विभाजित होता है। 
✴️प्रत्येक खंड पर वलयश्रेणियाँ होती हैं। 
✴️प्रत्येक खंड में शरीर की रचना उपस्थित रहती है। 
✴️इन जंतुओं में मध्यजनस्तर नहीं होता। 
✴️इनके शरीर में एक कोटर विकसित होता है, जिसमें अनेक महत्व के अंग स्थित होते हैं। 
✴️इनके तंत्रिका तंत्र और रुधिरवाहनी तंत्र सुपरिवर्धित होते हैं, जो कशेरुकी जीवों और मानव से बहुत भिन्न होते हैं।



आ्थ्रार्पेोडा (Arthropoda) संघ - 
✳️इसके अंतर्गत संधि पादवाले जंतु आते हैं। 
✴️ये ऐनेलिडा या इसी प्रकार के अन्य जंतुआं से विकसित होकर बने हैं। 
✳️ये ऐनेलिडा संघ के जंतुओं से बहुत कुछ समानता रखते हैं। 
✴️कड़े कवच सदृश इनकी त्वचा के कारण इनका शरीर कड़ा होता है। 
✳️शरीर में अनेक संधियों का होना, इनकी विशेषता है। 
✴️इस संघ के क्रस्टेशिया (Crustacea) वर्ग के जंतु पानी में रहते हैं। 
✳️इसके अंतर्गत झींगा मछली (lobtster), चिंगट मछली (crayfish), केकड़ा आदि आते हैं। 
 मकड़ी, बिच्छू, अश्वनालाकार केकड़े आदि इसके अंतर्गत आते हैं। 
✴️मिरिऐपोडा (Myriapoda) वर्ग के अंतर्गत अनेक पैरवाले जंतु, जैसे गोजर, शतपदी अदि आते हैं। इंसेक्टा (Insecta) वर्ग के अंतर्गत तीन जोड़ा पैरवाले और ✳️सामान्यत: पंख वाले जंतु आते हैं। 
✴️इनकी लगभग 6,00,000 जातियाँ मालूम हैं। 
✴️जंतुओं में ये सबसे अधिक विकसित जंतु हैं।


मोलस्का (Mollusca) संघ - 
✴️इस संघ के अधिकांश जंतु विभिन्न रूपों के समुद्री प्राणी होते हैं, पर कुछ ताजे पानी और स्थल पर भी पाए जाते हैं। 
✳️इनका शरीर कोमल और प्राय: आकारहीन होता है। 
✴️ये प्रवर (mantle) में बंद रहते हैं। 
✳️साधारणतया स्त्राव द्वारा कड़े कवच का निर्माण करते हैं। 
✴️कवच कई प्रकार के होते हैं। कवच के तीन स्तर होते हैं। 
✳️पतला बाह्यस्तर कैलसियम कार्बोनेट का बना होता है और मध्यस्तर तथा सबसे निचलास्तर मुक्ता सीप का बना होता है।
💠 इनमें खंडीभवन (segmentation) नहीं होता।

एकाइनोडर्माटा (Echinodermata) संघ - 
✳️इस संघ के अंतर्गत अरीय बहि:कंकाल वाले जंतु आते हैं। 
✳️तारामीन (starfish), समुद्री अर्चिन (sea-urchin), सैंड डॉलर्स (sanddollars) इसी के अंतर्गत आते हैं। 
✳️ये मंद चालवाले होते हैं और साधारणतया समूह में रहते हैं। 
✳️इनके डिंभ द्विपार्श्व सममित होते हैं, पर वयस्क त्रिज्यात: सममित (radially symmetrical) होते हैं। 
इनकी विशेषता यह है कि इनके शरीर में जल से भरी हुई नलियों की श्रेणियाँ रहती हैं, जिनसे अनेक पैर निकले रहते हैं। 
💠इन्हीं से इनमें गमनशीलता आती है।

कॉर्डेटा (Chordata) संघ - 
💠इस संघ के अंतर्गत रीढ़वाले जंतु आते हैं।
💠ये द्विपार्श्व सममित (bilaterally symmetical) होते हैं और अंशत: खंडों में विभाजित होते हैं। 
💠इन सबमें गिलछिद्र (gill slits), या कोष्ठ (pouch) होते हैं, जो जलीय जंतुओं में साँस लेने का कार्य करते हैं। 
💠पृष्ठ भाग पर पृष्ठरज्जु विकसित होते हैं। 
💠ऐनेलिड और आ्थ्राार्पेोडा में पृष्ठरज्जु अंदर रहते हैं। 
💠इस संघ के जंतुओं में एक लंबी नम्य शलाका (rod) होती है, जिसे पृष्ठरज्जु (notochord) कहते हैं। 
💠इसी से इनका शरीर तना हुआ रहता है। 
💠इस संघ के निम्नलिखित चार उपसंघ अधिक महत्व के हैं :

1. हेमिकॉर्डा (Hemichorda) - 
इस उपसंघ के प्राणी समुद्री जंतु हैं। इनके दो वर्ग हैं। देखने में ये ऐनेलिड जैसे लगते हैं, पर इनकी रचना ऐनेलिड जैसे लगते हैं, पर इनकी रचना ऐनेलिड से भिन्न होती हैं। इनमें कॉर्डेटा के सब लक्षण होते हैं, पर ये बहुत विकसित नहीं हैं। इनके शरीर के अग्र भाग में शुंड रहता है। इनके शरीर के अग्र भाग में शुंड रहता है, जिसके आधार पर कॉलर (collar) होते हैं।

2. यूरोकॉर्डा (Urochorda) - इस उपसंघ में कंचुक (tunicates) और समुद्री स्क्वर्स्ट (squirts) आते हैं। इनमें अनेक गिलछिद्र, तंत्रिकारज्जु और पृष्ठरज्जु होते हैं।

3. सेफैलोकॉर्डा (Cephalochorda) - इस उपसंघ के प्राणी छोटे पारभासक समुद्री जंतु हैं। देखने में मछली जैसे लगते हैं, पर इनकी रचना अधिक आद्य होती है। इनमें गिलछिद्र, तंत्रिकारज्जु तथा पृष्ठरज्जु, सब होते हैं। इनके उदाहरण ऐंफिआक्सस (Amphioxus) हैं।

4. वर्टिब्रेटा (Vertebrata) - 
💠इस उपसंघ के अंतर्गत रीढ़वाले जंतु आते हैं।
💠 इनमें पृष्ठरज्जु के स्थान में रीढ़ होती है। 
💠इनका पंजर अधिक विकसित होते है और इनके लक्षण (feature) अधिक विकसित होते हैं। 
💠इस उपसंघ के प्राणियों को सात वर्गों में विभक्त किया गया है:

(1) ऐग्नाथा (Agnatha) - इस वर्ग के अंतर्गत बिना जबड़ेवाले कशेरुकी आते हैं। लैंप्री (lamprey), कुहाकिनी मीन (hogfish, cyclostoma) इस वर्ग के प्राणी हैं।

(2) कांड्रिक्थीईज़ (Chondrichthyes) - इस वर्ग में उपास्थियुक्त मीन, हांगुर (shark), तनुका (skate) आदि आते हैं। इनमें जबड़े होते हैं, पर पंजर में हड्डी नहीं होती।

(3) ऑस्टिइक्थीईज़ (Osteichthyes) - इस वर्ग में हड्डीवाले विकसित मीन आते हैं। सामान्य भोजय मछलियाँ इसी वर्ग की होती हैं।

(4) ऐंफिबिया (Amphibia) - इस वर्ग के अंतर्गत मेढ़क, भेक (toad), सैलामैंडर (salamander) आदि आते हैं, जो जल और स्थल दोनों पर समान रूप से रहते हैं। इन कशेरुकियों के पैर विकसित होते हैं, जिससे ये स्थल पर भी चल सकते हैं।

(5) रेप्टिलिया (Reptilia) या सरीसृप वर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत कछुआ, छिपकली, साँप और मगर आते हैं, जो स्थल पर अंडे देते हैं। इनके अंडे कवचित होते हैं।

(6) ऐवीज़ (Aves) या पक्षिवर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत पक्षी आते हैं। ये लोग उड़नेवाले सरीसृपों के वंशज हैं।

(7) मैमैलिया (Mammalia) या स्तनी वर्ग - 
💠इस वर्ग के अंतर्गत मानव और मानव से मिलते जुलते अन्य प्राणी आते हैं। 

💠स्तनधारी गर्म खून वाले जानवर होते हैं जो अपने से छोटे बच्चों को जन्म देते हैं।

💠वे लगभग सभी प्रकार के आवासों में पाए जाने वाले जानवरों का सबसे प्रमुख रूप हैं।

💠उनके पास स्तन ग्रंथियां हैं जो उन्हें अपने छोटे बच्चों को खिलाने के लिए दूध का उत्पादन करने में मदद करती हैं

💠मस्तिष्क के क्षेत्र की उपस्थिति जिसे नियोकोर्टेक्स के रूप में जाना जाता है

💠उनकी त्वचा में तेल ग्रंथियाँ (वसामय ग्रंथियाँ) और पसीने की ग्रंथियाँ (सुडौल ग्रंथियाँ) होती हैं।

💠पूरे शरीर में बालों का फर जो जानवरों को उनके पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद करता है।

💠वे विषमलैंगिक हैं, अर्थात, विभिन्न प्रकार के दांतों के अधिकारी हैं।

💠स्तनधारियों में भी ग्रीवा कशेरुक होता है।

💠खोपड़ी dicondylic है।

💠ट्रंक को वक्ष और पेट में विभाजित किया गया है।

💠स्तनधारी फेफड़े के माध्यम से सांस लेते हैं।

💠स्तनधारियों के रूप में सुनने की अच्छी भावना 3 मध्य कान की हड्डियों के साथ सहायता प्राप्त है

💠स्तनधारियों के पास चार-कक्षीय हृदय होता है। 

💠एकल-बंधुआ निचले जबड़े की उपस्थिति।

💠मस्तिष्क अच्छी तरह से सेरिब्रम, सेरिबैलम और मेडुला में विभाजित है

💠उनके पास 12 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएं हैं।

💠डायाफ्राम के सबसे उन्नत रूपों में से एक का प्रदर्शन।

💠स्तनधारी भी अंडे दे सकते हैं। उन्हें विविपोरस के रूप में जाना जाता है।

💠स्तनधारी भी अंडे दे सकते हैं। उन्हें विविपोरस के रूप में जाना जाता है।


🔘स्तनधारियों का वर्गीकरण
स्तनिया में जानवरों के साम्राज्य का सबसे बड़ा वर्ग है। उनके प्रजनन के आधार पर, उन्हें तीन उपवर्गों में वर्गीकृत किया गया है:

✴️प्रोटोथीरिया

✴️Metatheria

✴️Eutheria

प्रोटोथीरिया
मोनोट्रेम के रूप में भी जाना जाता है, उप-वर्ग प्रोटोथेरिया में अंडे देने वाले स्तनधारी होते हैं। इसकी 6 प्रजातियों में से एक है
उदाहरण: डकबिल्ड प्लैटिपस, इचिडना

Metatheria
इस उप-वर्ग से संबंधित स्तनधारी अपरिपक्व युवा को जन्म देते हैं, इसलिए वे परिपक्व होने तक अपनी माँ की थैली में रहते हैं। उदाहरण के लिए, मार्सुपियल्स और कंगारू। 

Eutheria
इस उपवर्ग के तहत स्तनधारी युवा लोगों को जन्म देते हैं। युवा मां के अंदर विकसित होते हैं और मां से नाल के माध्यम से पोषण प्राप्त करते हैं। 

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